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भारतीय खान ब्यूरो, नागपुर

लेख

अंतरात्‍मा  की आवाज सुनें

(बढ़ते भ्रष्‍टाचार पर नियंत्रण हेतु कारगर उपाय) 

विवेक आत्‍मा का वह प्रकाश है जो व्‍यक्ति के मनोभावों की क्रिया में उद्भासित होता है । यह जीवन की भांति ही सत्‍य है जब कुछ भी सत्‍य से भिन्‍न सोचा जाता है अथवा किया जाता है तो विवेक उसका मुखर विरोध करता है । विवेक सत्‍य का वह स्‍वरूप है जो हमारे पूर्वजों द्वारा हमारे कृत्‍यों और भावों के सही या गलत होने संबंधी ज्ञान के रूप में हमें प्राप्‍त होता है ।

विवेक वह विशाल खाताबही है जिसमें हमारे गलत कार्यों का लेखा जोखा अंकित होता है । यह एक ऐसा साक्ष्‍य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता । यह सबकुछ नियंत्रित रखते हुए व्‍यक्ति को कभी डराता है कभी सहारा देता है, कभी उत्‍साहित करता है तो कभी दंडित भी करता है । यदि विवेक एक बार डिगता है तो यह चेतावनी होताहै, दो बार डिगे तो निंदनीय होता है, किंतु यदि यह दो से अधिक बार डिग जाए तो उस व्‍यक्ति को केवल ईश्‍वर ही बचा सकता है ।

कोई भी गलत कार्य करते समय कायरता सोचती है ‘क्‍या यह सुरक्षित है ? , लालच सोचता है ‘क्‍या इसमें कोई लाभ है ?  अहंकार सोचता है, क्‍या मैं इससे महान बन सकता हूँ ?  भोग लिप्‍सा सोचती है क्‍या इसमें आनंद है ?  लेकिन विवेक पूछता है ‘क्‍या यह उचित है ?  हम इसकी आवाज़ को अनसुना क्‍यों करते हैं ? इसकी चुभन के प्रति असंवेदनशील क्‍यों होते हैं ?  इसके प्रहार से अछूते क्‍यों रहते हैं ?  जवाब  है, भ्रष्‍टाचार ।

भ्रष्‍टाचार चेतना पर आघात है । घूस लेना तथा पक्षपात करना आज बहुत सामान्‍य बात हो गई है । महत्‍वपूर्ण पदों पर आसीन व्‍यक्तियों ने चेतना के प्रति विचार शून्‍यता ओढ़ ली है । वे सबकुछ ठीक होने का नाटक कर रहे हैं । क्‍या उन्‍हें क्रिया प्रतिक्रिया के सिद्धांत की जानकारी नहीं है । क्‍या वे यह भूल गए हैं कि अवचेतन मस्तिष्‍क का प्रभाव और उस पर दवाब कैसे कार्य करते हैं । अगर आप रिश्‍वत लेते हैं तो आपके विचार एवं कृत्‍य आपके अवचेतन मस्तिष्‍क में स्थित हो जाते हैं । क्‍या आप अपनी बेइमानी को अगली पीढ़ी में प्रतिस्‍थापित करके उसे बड़े संकट में नहीं डाल रहे हैं । यह एक दु:खद सत्‍य है कि भ्रष्‍टाचार जीवन के व्‍यक्तिगत एवं सामाजिक सभी अंगों को प्रभावित करते हुए जीवन का हिस्‍सा बन चुका है । यह केवल निरा भ्रष्‍टाचार नहीं हैं बल्कि इसके और भी कई स्‍वरूप हैं । उच्‍च पदों पर आसीन लोगों के अनैतिक चलन और शक्ति प्रदर्शन के तरीके ने छोटे लोगों के मस्तिष्‍क में अपराध बोध का भाव ही समाप्‍त कर दिया है । कितनी खतरनाक स्थिति है । हमारी महान सभ्‍यता अत्‍यंत खतरे में है ।

सदाचारी व्‍यक्ति ही अन्‍त:करण की शक्ति का उपयोग कर सकता है । केवल वही आत्‍मा की अंतरध्‍वनि को स्‍पष्‍टत: सुन सकता है । भ्रष्‍ट व्‍यक्ति में इस गुण का लोप होता है । उसकी अंतरात्‍मा  की संवेदनशीलता पाप या भ्रष्‍टाचार के कारण नष्‍ट हो जाती है । इस प्रकार वह गलत और सही में भेद करने में असमर्थ होता है । अग्रणी संस्‍थाएं, व्‍यापारिक  प्रतिष्‍ठान,संस्‍थान आदि भ्रष्‍ट कैसे हो जाते हैं ।  क्‍या अंतरमन को स्‍वच्‍छ रखने और फिक्र व सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्‍त रहने में बुद्धिमानी नहीं है । यदि आप आज गलत और पापयुक्‍त कार्य करते हैं और उसे हल्‍के में लेते हैं तो कल आप गंभीर अपराध करने में भी संकोच नहीं करेंगे । अगर आप एक पाप कर्म को अंत:करण में प्रवेश देकर फलने फूलने देते हैं तो इसका मतलब यह है कि आप हजार पापों के लिए रास्‍ते खोल रहे हैं । आपकी अंत:प्रज्ञा प्रभावहीन होकर अपनी संवेदना खो देगी । बुरे कर्म करने की आदत आपके पूरे शरीर को बिच्‍छू के जहर की भांति जहरीला बना देगी।

क्‍या आप जानते हैं कि जब आप भ्रष्‍ट होते हैं तब आपके भ्रष्‍टाचार की कमाई  से मजे ले रहे आपके बच्‍चे और अन्‍य लोग आपका मजाक उड़ाते हैं । आखिरकार वे आपके विषय में पूरी सूचना और जानकारी रखते हैं । आप अपने बच्‍चों के लिए बिलकुल भी आदर्श नहीं होते हैं । क्‍या यह अपमान ज्‍यादा नहीं है । हमारा समाज तेजी से उधर जा रहा है जहां उच्‍च पदों पर आसीन व्‍यक्तियों की अंतश्‍चेतना को भ्रष्‍टाचार से उसी प्रकार चुनौती प्राप्‍त हो रही है जैसे किसी एड्स रोगी के शरीर पर एचआईवी का हमला हो । भ्रष्‍टाचार हमारी जीवन रूधिर की प्रत्‍येक धमनियों में प्रवेश कर चुका है । क्‍या हम स्‍वयं को एक सभ्‍यता के रूप में सुरक्षित रख  सकते हैं ।

स्थिरचित्‍त होकर सकारात्‍मक सोचिए और अंतरमन की शुद्धता व फिक्र तथा सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्ति का आनंद उठाने के लिए आगे आइए । याद रहे, जीवन में शुद्धता लाने का एकमात्र उपाय अंतरात्‍मा की आवाज़ सुनना है ।

 

प्रतिरोधक सतर्कता

(एक विचार)

सतर्कता दो प्रकारकी  होती है ।

  1. दंडात्‍मक सतर्कता
  2. निरोधक सतर्कता

अब लेखक द्वारा प्रतिरोधक सतर्कता की अवधारणा पर बल दिया गया है । इसे एक बीमारी की प्रकृति से तुलना करके समक्षा जा सकता है ।

अ)   बीमारी :स्‍वाइन फ्लु

दंडात्‍मक उपाय : स्‍वाइन फ्लु से ग्रसित होना परीक्षण द्वारा सिद्ध हो जाने पर स्‍वाइन फ्लु के वायरस को डेमी फ्लु के द्वारा नष्‍ट कर दिया जाता है ।

निरोधक उपाय : मास्‍क का प्रयोग करें, कम से कम 6 फिट की दूरी बनाए रखें । हाथों को धोएं, इत्‍यादि ।

प्रतिरोधक उपाय : टीका लगवाएं, ऐसा करने से स्‍वाइन फ्लु का वायरस आक्रमण नहीं करेगा । इससे एक स्‍वाइन फ्लु मुक्‍त समाज का निर्माण होगा ।

ब)   बीमारी : भ्रष्‍टाचार :

दंडात्‍मक उपाय :यदि किसी व्‍यक्ति की सत्‍यनिष्‍ठा संदिग्‍ध है और जांच के बाद यह साबित हो जाता है तो उस व्‍यक्ति को उसके कार्यों के लिए दंडित किया जाए ।

निरोधक उपाय :एक ऐसी व्‍यवस्‍था/प्रणाली विकसित करें जो समाज में पारदर्शिता और जागरूकता लाएं ताकि भ्रष्‍टाचार को कम किया जा सके ।

प्रतिरोधक उपाय :अंतरात्‍मा* को जगाएं । इससे भ्रष्‍टाचार मुक्‍त समाज का निर्माण होगा ।

*विवेक आत्‍मा का वह प्रकाश है जो व्‍यक्ति के मनोभावों की क्रिया में उद्भासित होता   है । यह जीवन की भांति ही सत्‍य है जब कुछ भी सत्‍य से भिन्‍न सोचा जाता है अथवा किया जाता है तो विवेक उसका मुखर विरोध करता है । विवेक सत्‍य का वह स्‍वरूप है जो हमारे पूर्वजों द्वारा हमारे कृत्‍यों और भावों के सही या गलत होने संबंधी ज्ञान के रूप में हमें प्राप्‍त होता है

वैक्सिन का विकास करने के लिए अत्‍यधिक प्रयास की आवश्‍यकता होती है । उसी प्रकार, आज संदिग्‍ध सत्‍यनिष्‍ठा वाले व्‍यक्ति की अंतरात्‍मा को जगाने के लिए अथक प्रयत्‍न जरूरी है । इस दिशामें उठाए जाने योग्‍य कुछ कदम इस प्रकार हैं –

  1. मूल्‍य और नैतिकता जैसे विषयों पर संवाद आयोजित करना। मूल्‍य मानव के आंतरिक व्‍यवहार होते हैं इसलिए इमानदारी, सत्‍यनिष्‍ठा एवं सच्‍चाई जैसे सकारात्‍मक मूल्‍यों की स्‍थापना से समाज के साथ साथ राष्‍ट्र के प्रति भी व्‍यक्ति के योगदान में वृद्धि हो सकेगी।
  2. भ्रष्‍टाचार से होने वाले नुकसान पर प्रकाश डालते हुए तथा भ्रष्‍टाचार के कारणों एवं उसके स्‍थलों/भ्रष्‍टाचार के पदों को चिह्नित करते हुए लोगों को इस तथ्‍य के प्रति जागरूक करना कि  भ्रष्‍टाचार से लड़ने हेतु अंतरात्‍मा की शक्ति आवश्‍यक है ।
  3. भ्रष्‍टाचार निरोधी प्रयासों को समाज सेवा के अंतर्गत रखना इस प्रकार समाज को भ्रष्‍ट तरीके से धन संचित करने वाले धन्‍नासेठों का सम्‍मान करने की बजाय भ्रष्‍टाचारियों की निंदा करनी चाहिए ।
  4. समाज में लोगों को अपनी बेटी का विवाह किसी ज्ञात भ्रष्‍टाचारी के साथ नहीं करना चाहिए । जैसा कि आजकल समाज भ्रष्‍टाचार अनुकूल पद पर बैठे व्‍यक्ति से ही अपनी पुत्री के विवाह को प्राथमिकता देता है ।
  5. कक्षा एक से ही पाठ्यक्रम में भ्रष्‍टाचार के विभिन्‍न पहलुओं और उसके रोकथाम के उपाय पर प्रकाश डालते हुए भ्रष्‍टाचार निरोध विषय पर एक अध्‍याय जोड़ना । परीक्षा में इस प्रकरण से प्रश्‍न अनिवार्यत:  पूछे जाने चाहिए ।